Monday, April 22, 2024
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आलू की खेती से किसान कर रहे है अच्छी कमाई, जाने इसकी उन्नत किस्मों, और खेती से जुड़ी जानकारिया

आप भी जानते है आलू की खेती हमारे पुरे भारत देश में की जाती है। सबसे अधिक मात्रा में इसकी खेती उत्तर बिहार में किसान आलू की खेती बबाड़ी मात्रा में करते है। ऐसे में अगर उत्तर बिहार के किसान आलू की बुवाई करने के बारे में सोच रहे है तो वह इस खेती से अच्छा खासा मुनाफा कमा सकते है। उत्तर भारत में आलू की खेती किसान कुछ अलग तरीके से करते है और इस खेती को अलग तरीके से कर के किसान अच्छा मुनाफा कमा रहे है। खास बात यह है कि इसके लिए किसानों को एक हेक्टेयर में 25 से 30 क्विंटल बीज का इस्तेमाल करना चाहिए।

आलू की विभिन्न किस्मे

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आलू की खेती करने के लिए इसकी उत्तम किस्मों का पता होना ज्यादा जरुरी होता है। इनमें कुफरी चंद्रमुखी, कुफरी अलंकार, कुफरी बहार, कुफरीन नवताल G 2524, कुफरी ज्योति, कुफरी शीत मान, कुफरी बादशाह, कुफरी सिंदूरी, कुफरी देवा, कुफरी लालिमा, कुफरी लवकर, कुफरी संतुलज, कुफरी अशोक, कुफरी चिप्सोना-1, कुफरी चिप्सोना-2, कुफरी गिरिराज और कुफरी आनंदव प्रमुख हैं. ऐसे में किसान इनमें से किसी भी अच्छे किस्मो के बीजो की खेती कर सकता है।

इस तरह से करे बुआई

इस खेती को करने के लिए इससे रोशनी, पानी और पोषक तत्वों के लिए उनमें होड़ बना दी जाती है। इस वजह से छोटे माप के आलू बढे होते है। वहीं, अधिक फासला रखने से प्रति हेक्टेयर में पौधों की संख्या कम हो जाती है, जिससे आलू का मान तो बढ़ता है, लेकिन उसकी उपज में बहुत ज्यादा कमी आ जाती है। इसलिए पंक्तियों से पंक्तियों के बीच में 50 सेंटीमीटर का अंतर और पौधों से पौधों में 20 से 25 सेमी की दूरी रखनी बहुत ज्यादा जरुरी होती है। इस तरह आप इस खेती से अच्छी पैदावार कर सकते है।

खाद उरवर्क का प्रयोग

गोबर की सड़ी हुई खाद 50-60 क्विंटल और 20 किलोग्राम नीम की खली को अच्छी तरह से मिलाकर प्रति एकड़ भूमि में समान मात्रा में छिड़काव कर जुताई के बाद आप बुआई कर सकते है नाइट्रोजन 45-50 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर दीजिये। फास्फोरस: 45-50 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर. पोटैशियम 40 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से आप इसका इस्तेमाल कर सकते है। गोबर, फास्फोरस तथा पोटाश खादों को खेत की तैयारी में रोपाई से पहले मिट्टी में मिला दीजिये।

खेती की देखभाल

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आलू की खेती में खरपतवारओं की समस्या मिट्टी चढ़ाने से पहले अधिक ज्यादा होती है। यह समस्या निराई, गुड़ाई और मिट्टी चढ़ाने से बहुत कम हो जाती है। फिर भी किन्हीं- किन्हीं स्थानों पर खरपतवार इतनी अधिक हो जाती है कि वे आलू के पौधे निकलने से पहले ही उन्हें ढक देती है। इसके कारण आलू की फसल में थोड़ी मात्रा में कमी आ जाती है।

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