Monday, April 22, 2024
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कम लागत में हल्दी की खेती से किसान कमाएगा लाखों रुपय, जाने इसकी खेती और उन्नत किस्मों के बारे में

हल्दी की खेती के बारे में आप भी जानते है इसकी डिमांड मार्किट हमेशा बहुत अधिक रहती है। हल्दी एक उष्णकटिबंधीय मसाला की फसल है। जिसकी खेती से किसान अच्छा मुनाफा कमा सकता है। जिसकी खेती इसके कंद हेतु की जाती है। इसका उपयोग मसाला, रंग-रोगन, दवा व सौन्दर्य प्रसाधन के क्षेत्र आदि में किया जाता है। इसके कंद पदार्थ-टर्मेरॉल का उत्पादन होता है। इसके कंद में उच्च मात्रा में उर्जा खनिज पाए जाते है। हमारे देश में इसकी खेती बढे पैमाने पर की जाती है। और किसान इसकी खेती से बहुत अधिक पैसा कमा सकता है। इसकी खेती किसान के लिए बहुत ज्यादा फायदेमद होती है।

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हल्दी की खेती के किये जलवायु

इस खेती के लिए अच्छी बारिश वाले गर्म व आर्द्र क्षेत्र इसका उत्पादन किया जाता है , इसकी खेती 1200 मीटर उंचाई तक वाले क्षेत्र में की जाती है जहा सिचाई की पूरी व्यवस्था हो। इस तरह के क्षेत्र में इसकी खेती अच्छी तरह से होती है।

इसकी खेती के लिए मिट्टी

हल्दी की खेती के लिए सबसे जयदा फायदेमंद मिटटी दोमट मिटटी और काली मिट्टी होती है। इसमें इसकी पैदावार अच्छी की जाती है। कम्पोस्ट देकर कम उपजाऊ बलुई दोमट मिट्टी में भी इसकी अच्छी उपज की जा सकती है। इसकी खेती ऐसे जगह पर करे जहा से पानी निकलने की पूरी व्यवस्था हो। इस तरह की मिट्टी में इसकी खेती की पैदावार अच्छी होती है।

हल्दी की विभिन्न किस्में

हल्दी की किस्मे ‘कस्तुरी’ वर्ग की किस्में – रसोई में उपयोगी, 7 महीने में फसल तैयार, उपज कम। जैसे-कस्तुरी पसुंतु। मध्यम समय में तैयार होने वाली केसरी वर्ग की किस्में – 8 महीने में तैयार, अच्छी उपज, अच्छे गुणों वाले कंद। जैसे-केसरी, अम्रुथापानी, कोठापेटा।लंबी अवधि वाली किस्में – 9 महीने में तैयार, सबसे अधिक उपज, गुणों में सर्वेश्रेष्ठ। जैसे दुग्गीराला, तेकुरपेट, मिदकुर, अरमुर। मीठापुर, राजेन्द्र सोनिया, सुगंधम, सुदर्शना, रशिम व मेघा हल्दी-1 आदि सभी हल्दी की किस्मे है।

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रोपण

भारी मिट्टी वाली जमीन में अच्छे से जुताई कर के इसकी खेती की जाती है। हल्की मिट्टी वाले क्षेत्र में समतल जमीन में ही इसके कंदों अथवा उत्तक संवर्धित पौधों की रोपाई करनी पढ़ती है। इसके लिए क्यारियों का आकार आपके सुविधा के अनुसार होना चाहिए। इसकी रोपाई हेतु मातृ कंद अथवा नये कंद-दोनों का इस्तेमाल किया जाता है। मातृ कंद 10 क्विंटल व नये कंद 8 किवंटल अथवा 90 हजार उत्तक संवर्धित पौधे प्रति एकड़ की दर से रोपाई की जाती है। इस तरीके से इसकी रोपाई की जाती

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